"चपरासी के लिए डिग्री जरूरी, लेकिन देश चलाने के लिए नहीं!"
चपरासी के लिए योग्यता जरूरी, लेकिन देश चलाने वालों के लिए नहीं? नेताओं की शैक्षणिक योग्यता, जनसेवा और लोकतंत्र पर एक तीखा और विचारोत्तेजक लेख।
6/1/20261 min read


सेवा या नौकरी? फैसला आपको करना है
आजकल चुनाव आते ही नेताओं के भाषणों में एक शब्द सबसे ज़्यादा सुनाई देता है — "हम देश की सेवा कर रहे हैं।"
अब सवाल यह है कि क्या सच में इसे सेवा कहा जाए?
जहाँ तक मेरी समझ है, सेवा वह होती है जो बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी लाभ की उम्मीद के की जाए। जैसे कोई भूखे को खाना खिलाए, किसी जरूरतमंद की मदद करे या समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम करे।
लेकिन जब किसी काम के बदले वेतन, भत्ते, सरकारी बंगला, सुरक्षा, गाड़ी और दूसरी सुविधाएँ मिल रही हों, तो उसे सेवा कहना कितना उचित है? उसे तो जिम्मेदारी, कर्तव्य या नौकरी कहना ज्यादा सही लगता है।
अगर एक शिक्षक यह कहे कि वह सेवा कर रहा है, एक डॉक्टर कहे कि वह सेवा कर रहा है, एक सरकारी कर्मचारी कहे कि वह सेवा कर रहा है, तो फिर यह बात कुछ हद तक समझ में आती है क्योंकि उनका काम सीधे लोगों की मदद करना है। लेकिन राजनीति में "सेवा" शब्द का इस्तेमाल कई बार इतना अधिक हो जाता है कि लगता है जैसे जनता नहीं, बल्कि शब्दों की सेवा हो रही है।
सबसे बड़ा सवाल
हमारे देश में चपरासी की नौकरी के लिए भी योग्यता तय है।
क्लर्क बनने के लिए योग्यता चाहिए।
शिक्षक बनने के लिए योग्यता चाहिए।
यहाँ तक कि कई निजी कंपनियों में इंटरव्यू देने के लिए भी डिग्री चाहिए।
लेकिन सांसद, विधायक, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनने के लिए कोई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है।
यानी जिस व्यक्ति का काम फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक पहुँचाना है, उसके लिए योग्यता जरूरी है। लेकिन जिस व्यक्ति के फैसले पूरे राज्य या देश की दिशा तय करते हैं, उसके लिए नहीं।
यह बात सुनने में थोड़ी अजीब तो लगती है।
UPSC वाले की किस्मत
भारत में लाखों युवा UPSC की तैयारी करते हैं। कई लोग पाँच-पाँच, छह-छह साल तक किताबों में सिर खपाते हैं। दिन-रात मेहनत करते हैं, तब कहीं जाकर कुछ लोग IAS बन पाते हैं।
फिर वही IAS अधिकारी किसी ऐसे नेता के निर्देशों का पालन करता है जिसकी पढ़ाई शायद उस अधिकारी के मुकाबले बहुत कम हो।
अब यह व्यवस्था सही है या गलत, इसका फैसला मैं नहीं करूँगा। लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि यह सवाल पूछना गलत नहीं है।
डिग्री ही सब कुछ नहीं है
यह भी सच है कि केवल डिग्री होने से कोई महान नेता नहीं बन जाता। इतिहास में कई ऐसे नेता हुए हैं जिनकी औपचारिक शिक्षा बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन उनकी समझ, ईमानदारी और नेतृत्व क्षमता अद्भुत थी।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि आज का शासन पहले जैसा नहीं है। आज अर्थव्यवस्था, तकनीक, विदेश नीति, साइबर सुरक्षा और प्रशासन जैसे जटिल विषयों पर निर्णय लेने पड़ते हैं। ऐसे में कम से कम बुनियादी शिक्षा की अपेक्षा करना कोई गलत बात नहीं है।
असली समस्या क्या है?
समस्या नेताओं से ज्यादा शायद हमारी है।
हम चुनाव के समय जाति देखते हैं।
धर्म देखते हैं।
पार्टी देखते हैं।
भीड़ देखते हैं।
लेकिन उम्मीदवार की योग्यता, काम और जवाबदेही पर कम चर्चा करते हैं।
हम सवाल पूछने से बचते हैं। कभी डर की वजह से, कभी सुविधा की वजह से और कभी इसलिए कि "सब ऐसे ही चलता है।"
धीरे-धीरे हमने भीड़ के साथ चलना सीख लिया है।
जहाँ वजन, वहाँ भजन।
निष्कर्ष
नेताओं को चुनने का अधिकार जनता के पास है और जिम्मेदारी भी जनता की ही है।
यदि हम योग्य, ईमानदार और जवाबदेह लोगों को चुनेंगे तो व्यवस्था बेहतर होगी। लेकिन अगर हम केवल नारों, वादों और भावनाओं के आधार पर वोट देंगे तो फिर शिकायत करने का अधिकार भी थोड़ा कमजोर पड़ जाता है।
लोकतंत्र में जनता मालिक होती है और नेता जनता का प्रतिनिधि।
लेकिन अफसोस की बात यह है कि कई बार मालिक सवाल पूछने से डरता है और प्रतिनिधि जवाब देने की जरूरत नहीं समझता।
जिस दिन जनता सवाल पूछना शुरू कर देगी, उस दिन "सेवा" और "सत्ता" के बीच का अंतर खुद-ब-खुद साफ हो जाएगा।