देश आगे बढ़ रहा है... या हम सिर्फ़ यही सुन रहे हैं?
क्या विकास सिर्फ़ भाषणों, आंकड़ों और सरकारी योजनाओं से तय होता है, या फिर आम नागरिक की आर्थिक स्थिति से? जब करोड़ों लोग मुफ्त राशन पर निर्भर हों, युवा रोजगार के बजाय भत्तों की उम्मीद करें और पढ़े-लिखे लोग देश के मुद्दों पर बोलने से डरें, तब विकास की असली तस्वीर क्या है? इस ब्लॉग में इन्हीं सवालों पर एक तीखा कटाक्ष और गंभीर चिंतन।
6/1/20261 min read


कल बहुत समय बाद एक टीवी डिबेट शो देखने का मौका मिला। एक समय था जब डिबेट में अलग-अलग विचारधाराओं के लोग खुलकर अपनी बात रखते थे। कोई सही होता था, कोई गलत, लेकिन फैसला जनता पर छोड़ दिया जाता था। लोग सुनते थे, सोचते थे और फिर तय करते थे कि सच किसके साथ खड़ा है।
लेकिन अब ऐसा लगता है कि बहस का मकसद विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि तयशुदा निष्कर्ष तक पहुंचना रह गया है।
कहते हैं शिक्षा इंसान को समझदार बनाती है। उसे सही और गलत में फर्क करना सिखाती है। उसे सवाल पूछने और जवाब तलाशने की क्षमता देती है। मगर एक सवाल मुझे हमेशा परेशान करता है—जैसे-जैसे हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे देश के मुद्दों पर खुलकर बोलने वाले लोग कम क्यों होते जा रहे हैं?
शायद इसलिए क्योंकि आज हर कोई सुरक्षित रहना चाहता है।
लोग सोचते हैं कि अगर हमने कोई ऐसी बात कह दी जो कुछ लोगों को पसंद नहीं आई तो कहीं हम किसी मुसीबत में न पड़ जाएं। जिस देश के लिए हम आवाज़ उठाएंगे, क्या वही देश मुश्किल समय में हमारे साथ खड़ा होगा? क्या हमारे परिवार की जिम्मेदारी लेगा? शायद नहीं। और अगर यह सच है, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
आज अगर कोई देश के मुद्दों पर सवाल उठाता है तो उसे तुरंत किसी न किसी खेमे में खड़ा कर दिया जाता है। मानो सवाल पूछना देशभक्ति या देशद्रोह का प्रमाणपत्र बन गया हो।
कुछ लोग कहेंगे कि ऐसा नहीं है, लोग बोल रहे हैं।
बिल्कुल बोल रहे हैं। लेकिन 140 करोड़ की आबादी वाले देश में अगर कुछ हजार लोग ही खुलकर अपनी बात रख पा रहे हैं, तो क्या इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी का उत्सव कहा जाएगा या खामोशी का विस्तार?
और फिर विकास की बात होती है।
हमें बताया जाता है कि देश तेजी से आगे बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। दुनिया में भारत का डंका बज रहा है।
सवाल यह नहीं है कि यह सब गलत है।
सवाल यह है कि अगर सब इतना अच्छा है, तो फिर देश की लगभग 80 करोड़ आबादी आज भी सरकारी राशन पर निर्भर क्यों है? अगर एक परिवार कुछ सौ रुपये का अनाज भी अपनी कमाई से खरीदने में सक्षम नहीं है, तो क्या हमें सिर्फ़ आंकड़ों के विकास पर खुश होना चाहिए या इंसानों के विकास पर भी बात करनी चाहिए?
अगर युवा रोजगार के अवसरों पर चर्चा करने के बजाय बेरोजगारी भत्ते की उम्मीद में वोट देने लगें, तो क्या यह विकास का संकेत है या अवसरों की कमी का?
अगर सरकारें फैक्ट्रियां लगाने, उद्योग बढ़ाने और स्थायी रोजगार पैदा करने की जगह योजनाओं के नाम पर पैसा बांटने को ही सबसे आसान समाधान मानने लगें, तो क्या हम आत्मनिर्भर समाज बना रहे हैं या निर्भर नागरिक?
कटाक्ष यह नहीं है कि योजनाएं गलत हैं।
कटाक्ष यह है कि जब मुफ्त सुविधाएं अधिकार बन जाएं और रोजगार अवसर नहीं, तब विकास की परिभाषा बदल जाती है।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम विकास को सड़क, पुल और इमारतों में माप रहे हैं, जबकि असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या आम आदमी पहले से बेहतर जीवन जी रहा है? क्या वह बिना सरकारी सहायता के सम्मानपूर्वक अपना घर चला सकता है? क्या उसके बच्चे भविष्य को लेकर आश्वस्त हैं?
देश का विकास तब नहीं होता जब सरकार यह साबित कर दे कि उसने कितना खर्च किया।
देश का विकास तब होता है जब नागरिकों को सरकारी मदद की जरूरत कम पड़ने लगे।
शायद इसी वजह से आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि देश आगे बढ़ रहा है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश के साथ-साथ देशवासी भी आगे बढ़ रहे हैं या नहीं।
और जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलता, तब तक "विकास" एक उपलब्धि कम और एक राजनीतिक नारा ज़्यादा लगता रहेगा।